फाल्गुन की होली
Sakshi
- 2 minutes read - 218 wordsआज फ़िर एक नई सुबह थी। सूरज की रोशनी कमरे के खिड़की के पर्दों से छन कर मेरी बंद आँखों पर बैठ, मेरे उठने का इंतज़ार कर रही थीं। मुझे रोशनी में नींद नहीं आती, ये उन्हें पता था। आखिर उठना ही पड़ा।
कमरे से निकल कर बाहर आई तो देखा कि घर के नीम के पेड़ पर फल लग गए हैं। एक अजीब सी खुशबू है। नीम की? फाल्गुन के मौसम की?
चबूतरे पर कोई नहीं है। अजीब बात है। सपने में तो देखा था कि दादी बैठी हैं। शायद सुबह का सपना नहीं था।
होली के दिन चारों तरफ सन्नाटा रहता है। बचपन में हम बच्चे घर की पानी से भरी टंकी में कूद कूद कर शोर करते थे। आज शोर है तो बस ख्यालों का, मन में हज़ारों सवालों का।
ख़ैर, सेमल के पेड़ पर आज भी लाल फूल हैं। नीम के नए, लाल पत्ते भी उग आए। आम के उस पेड़ पर सफेद बौर लग गए जिन्हें दादी ने सालों पहले लगाए थे। पीली धूप उन हरे पौधों पर रंग डाल रही है जिन्हें मैंने पिछले महीने लगाए थे – इस साल घर पर होली नहीं मनाई जाएगी, ये उन्हें किसी ने थोड़ी न बताया था!
कैसे एक ही वक़्त पर इज़्तिरार और सुकून का एहसास हो जाता है, अजीब पहेली है।
*इज़्तिरार- बेचैनी
